अन्ना
जिस दिन
तुम हार जाओगे
हम गीता और रामायण
कर देंगे हवाले
दराजो के
उस दिन
गांधी की तस्वीर
कर देंगे परदा
मिटा देंगे
हर उस इबारत को
जो दावा करती है
सचाई की जीत का
सच अन्ना
तुम्हारा जीतना
ज़रूरी नहीं है
सिर्फ तुम्हारे लिए
बल्कि
बेहद ज़रूरी है
सच की
आस्थाओं के लिए।
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यह कविता १९९८ में लिखी गयी थी जब अन्ना महाराष्ट्र में भष्ट्राचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे और मैं राजस्थान के दूर-दराज में अपने गाँव में उनकी खबरे पढता था. आज १३ साल बाद भी यह प्रासंगिक है.














