शुक्रवार, अगस्त 03, 2012

२ अगस्त, जंतर-मंतर

('अन्नादोलन' के बरक्स मैंने चार कवितायें लिखी हैं. उसी क्रम में अंतिम कड़ी, जो चुनावी अन्ना पार्टी की घोषणा के बाद लिखी है.. बाकी 3 कवितायें मेरे इसी ब्लॉग पे मौजूद हैं. )

बहुत हुआ अन्ना,
अब घर चलते हैं
थक गया हूँ..
मैं भी तुम्हारी तरह
 
ये बात और है कि
कभी इसी जंतर-मंतर से
भरी थी आख़िरी दम तक लड़ने की हुंकार..
देख रहा हूँ यहीं पे सच की हार
आपने तो यहीं से नाप लिया
चुनावी तंतर का रास्ता

हम भी चलते हैं 
देहात में चोट्टे सरपंच 
और बेशरम बाबू को खुश करके 
इंदिरा आवास पास कराना है 
उनके लठैतो से डरकर 
उन्ही को जीताना है
लिहाजा तुम्हारे कुछ भक्त
अन्ना टोपी को उलटकर बना लेंगे नाव
जीतने के लिए चुनाव
बस दुःख यही है..कि

अब से अगस्त को
एक क्रान्ति के गर्भपात के लिए भी
याद किया जाएगा..
किसी भी ईमानदार कोशिश
की जयकार से पहले
देश सौ बार सोचेगा.
अन्ना !
तुम्हारे साथ-साथ
सच के प्रति आस्था भी हारी है.

गुरुवार, अगस्त 02, 2012

अन्ना-हार या जीत?

अन्ना,
तुमको हरा दिया..
जिनके तुम सामने खड़े थे
और जो तुम्हारे पीछे थे उन्होंने भी
एक सुनहरे ख़्वाब को
ला खडा कर दिया...
घने बीहड़ में..
जहां तुम्हे भी बनना होगा नरभक्षी
औरो की तरह..
करनी होगी मैली अपनी भी चादर ..
इनसे लड़ने, ताकत बटोरने के लिए..
आखिर थाम ही लिए तुमने वो हथियार..
जो दुश्मन चाहता था..
ताकि तुम खुद क़त्ल कर दो
देश के एक रूमानी सपने को
खडा कर दो एक और भस्मासुर
अपनी जनता के लिए
छोड़ जाओ एक निर्लज्ज विरासत..
कर दो वही गलतियाँ..
जो कभी बापू ने की थी...
फंस जाओ तिकड़मो में..
ताकि बुझ जाए देश का जज्बा..
आसान हो जाए उनकी राहें
और चलता रहे उनकी लूट का खेल..
अनवरत. बेधड़क.

शुक्रवार, अगस्त 26, 2011

अन्ना, भ्रष्टाचार और मैं

हमने भी मशाल पकड़ी
एक दिन के लिए ही सही
टोपी पहनकर 'अन्ना' हो लिए
कुछ जमकर नारे लगाए
भ्रष्टाचार के खिलाफ
एसएमस भी किए,
कुछ मेल भी
फेस बुक पर भी गरजे
मानो,
भगतसिंह और सुखदेव की रूह हम में गयी हो
और इस तरह निपट लिए
भ्रष्टाचार के खात्मे की जिम्मेदारी से

अगले हफ्ते चोर नेताओं -अफसरों के खिलाफ
सारे गुस्से का 'वीर्यपात' हो चुका था
राशन के दफ्तर में
खुशी-खुशी डेढ़ हजार दे आए
चुनाव के दिन परिवार के साथ निकले-
छूट्टी मनाने
इधर,
संसद में वही चोर वापस मिले
अब मैं बुदबुदाता रहता हूँ..
'साला सिस्टम ही खराब है'
घर पर..
पोंछा बनी 'अन्ना टोपी'
मुझे चिढाते हुए
कह रही है ...
देश की गन्दगी ना सही..
घर की गन्दगी तो साफ़ कर लूं.

गुरुवार, अगस्त 25, 2011

अन्ना



अन्ना

जिस दिन

तुम हार जाओगे

हम गीता और रामायण

कर देंगे हवाले

दराजो के

उस दिन

गांधी की तस्वीर

कर देंगे परदा

मिटा देंगे

हर उस इबारत को

जो दावा करती है

सचाई की जीत का

सच अन्ना

तुम्हारा जीतना

ज़रूरी नहीं है

सिर्फ तुम्हारे लिए

बल्कि

बेहद ज़रूरी है

सच की

आस्थाओं के लिए।

------------------------------

यह कविता १९९८ में लिखी गयी थी जब अन्ना महाराष्ट्र में भष्ट्राचार के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे थे और मैं राजस्थान के दूर-दराज में अपने गाँव में उनकी खबरे पढता था. आज १३ साल बाद भी यह प्रासंगिक है.

बुधवार, अप्रैल 28, 2010

कुंठाएं


कागज़ पर पड़ी
उल्टी-सीधी रेखाएं
लक्ष्य-विहीन

अस्त-व्यस्त
दर्प से ग्रस्त
एक-दूसरे को
दबाने-काटने को उतारू

कुंठा से सनी
न उभर पाती
न ही उभरने देती
दूसरों के आस्तित्व को

इसी जद्दोजहद में
नहीं ढल पाती
किसी सुन्दर कृति में

सृजन की आंच की बजाय
जो झुलसी हैं
ईर्ष्या की दाह से
लिए हुए दर्द
एक-दूसरे को न निगल पाने का
------------------
सम्प्रति: समग्र साहित्य की वेब पत्रिका 'हिंद युग्म' की माह जून २००९ की यूनिकवि स्पर्धा में शीर्ष दस कविताओं में स्थान प्राप्त.

रविवार, अगस्त 16, 2009

‘मेरा गेपसागर’

जहां बादल* हो जल के ऊपर

जहां सुस्ताएँ थके हुए डगर
जहां अभिषेक हो श्रीनाथ का

जहां बिराजे हो राजराजेश्वर

हाँ, वहीं मेरा गेपसागर

जहां शाम ढले चौपाटी सजे

किनारे बिछड़े दिल मिले

जहां ताजिओं को मिले ठंडक

तीज-त्यौहार पर हो अरचन

हाँ, वहीं है मेरा गेपसागर


जिसकी बांहों में हो बाजार

सिरहाने पसरे हो डूंगर

लहरों पर तैरना सीखे बचपन

जहां दूर के पंछी करें बसर

हाँ, वही है मेरा गेपसागर


नाज करे जिस पर जन-मन

जाने जो इतिहास का सफ़र

जिससे पहचाना जाए शहर

हाँ, वही है मेरा गेपसागर

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

प्रस्तुत कविता मेरे गृह जिले डूँगरपुर (राजस्थान) के मशहूर 'गेपसागर' तालाब पर लिखी गयी है
*तालाब में स्थित 'बादल-महल' फोटो: कमलेश शर्मा 'कक्कू'

#१५ अगस्त २००९ को 'राजस्थान पत्रिका' के स्थानीय संस्करण में प्रकाशित हुई है.

सोमवार, जून 15, 2009

सरहदें

सरहदें हैं

कुछ मुटावों की

शिकवों-गिलों की


तैनात है जहां

अपने-अपने अहम

पैनी निगाहों के साथ

मगर

हवाओं में खुशबू सी

सूरज के उजियारे सी

खलिश रुकी कहाँ


अपनापन थमा कहाँ

अपनी-अपनी सरहदों में

कैद हैं हम


कुछ खलिश लिए

और कुछ अपनापन भी।

-----------------

सम्प्रति: समग्र साहित्य की वेब पत्रिका 'हिंद युग्म' की मई माह की यूनिकवि स्पर्धा में शीर्ष दस कविताओं में स्थान प्राप्त. एवं इसके बाद www.aakhar.org में भी प्रकाशित.

गुरुवार, मार्च 06, 2008

रास्ते


रास्ते,

जो मंजिलों तक हैं

बिना खलल के

तो वे

कहीं नहीं जाते !

---------------

बारूद

भगत
तुम जो बारूद
बो गए हो
दिलों में

पहुँच न पाया
वह जेहन तक

क्योंकि उस पर सवार हैं
कई सफ़ेद टोपियाँ,
नपुंसक बना रही हैं
जो तेरे बारूद को

लिहाज़ा हमने
दिल ही जला दिए
तुम जो बारूद छोड़ गए हो।
--------------------------

बुधवार, मई 31, 2006

एलियन

बिना सोचे-समझे
करे सच्ची बात
न देखे नफ़ा-नुकसान
बोले बड़ा बेलाग
न किसी के ख़िलाफ़ न साथ है
ये शख्स बेहद खतरनाक है
न खौफ है न लोभ
न धर्म है न जात
न सहे चुपचाप
न रखे द्वेष-राग
जानता हर बात है
ये शख्स बेहद खतरनाक है

होली

फ़िर मासूमों के साथ

न खेले कोई 'निठारी होली'

फ़िर कोई 'समझौते' पर

न करे कोई सीना-जोरी

फ़िर 'जेहाद' के नाम पर

कोई न रंगे रेल खून से

फ़िर कोई भूखा किसान

न खेले 'खुदकुशिया' होली

फ़िर कोई 'अर्जुन' न जलाए

युवा अरमानों की होली

होकर मानवता के हमजोली

आओ खेले हम प्यार से होली

मंगलवार, मई 30, 2006

बचपना

हम बच्चों को
बताते हैं-
अपने-पराए का भेद
नफे-नुकसान का गणित,
गिनाते हैं-
चाकलेट की खामियां
रटाते हैं 'पॉयम'
सलीका मेहमानों से बोलने का
गुर दुनियादारी के,

उनका बचपना छीनने का

कितना बचपना करते हैं हम।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सूरज

सूरज के आने की
धमक होती नहीं
ढोल-नागाडो से
ना कोई घोषणा
ना कोई एलान
तिमिर की छाती भेदकर
बस आ जाता है वह
गुपचुप
पसर जाता है
हर तरफ़।
..................

हादसे

हादसे
अब नहीं लगते हादसे
उनकी आहट
नहीं करती विचलित
हादसे
अब नहीं लगते डरावने
न ही फटती हैं आंखें
उन्हें देखकर
सुन्न नहीं होता शरीर
बिना लहू सा
अब मैं नहीं करता उम्मीद
बिना हादसों की जिंदगी की
क्योंकि ऐसा होना ही
एक हादसा होगा।
.............................................................
राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका 'मधुमती'-अक्तूबर २००५ में प्रकाशित.

सड़क

खस्ताहाल सड़क ओबरी की
लाती है
एक टूटी बस हर रोज
करती है तृप्त
ठेकेदार की लालच
सजाती है
अफसरों के मस्टर

हर पांचवे बरस
वह हो जाती है मुद्दा
चुनाव जीतने का

किसी द्वीप से बचे
इसके काले-धूसर डामर पर
लिखते हैं बच्चे खडिया से
तो छप्पक-छई बन जाते हैं
इसके गड्डे बारिश में

बड़े काम की है
सड़क ओबरी की
सिवा एक सड़क के रूप में !
..................................................
# 'युगनाद' २००६, उदयपुर में एवं www.aakhar.org में प्रकाशित
*ओबरी -लेखक का गांव

गर्दिश

बहुत दिनों से
हँसा नहीं हूँ
कि तुम नहीं हो
या आशा-अपेक्षा भरी
कितनी ही नजरें
गडी हैं मेरे चेहरे पर
पीते हुए लोच चेहरे का
या मैं सुनने लगा हूँ
बाबा की लाचार आँखें
पढने लगा हूँ
बहन का सयानापन
या थामने चला हूँ दौर गर्दिशों का।

सिलसिला

तुमने ही बुने थे
ताने-बाने प्रेम के
तुमने ही बनाए थे
रास्ते मुझ तक

शुरूआत तुम्हारी थी
मैं सिर्फ़ जरिया था
तुम्हारी मंजिल का

नीम रात की सियाह राहों में
अपने हौंसले के रौशनी में
लादकर तुम्हें
चलता रहा मैं
निढाल होने तक

इससे पहले के
मैं होश संभालता
तुम मुखातिब हो चुकी थी
अगली मंजिल की ओर
शाम का सुहानापन जो था...
~~~~~~~

सुकून

औरों के लिए
बड़ी शिद्दत से
उगाई हैं हमने
नागाफनियाँ
अंदर-बाहर
हर तरफ़
शायद
दुख देकर
पाया है
ज़्यादा सुकून
बजाय ख़ुद के सुख से।
...................

नदी

मरीन ड्राइव के प्रोमोनैड पर
बैठकर
ढूँढता हूँ
वो नदी
जो निकली थी
अरावली के पहाडों से
और उसे न पाकर
करता हूँ तसल्ली
कि
इस महासागर में आकर
सिर्फ़ मैं ही
नहीं बदला हूँ ।
~~
# 'मधुमती', अक्तू २००५ में प्रकाशित

समरसता

जंगल जाग रहे हैं
इससे पहले कि
छाती में
दावानल लिए
वे शहर का रुख करें
शोषण से सने हाथों को
पोंछ लेना
समरसता के संकल्प से
तरजीह देना
इन्सान की तरह।
...........

नश्वर

धरे के धरे रह जाएंगे
किले, राजमहल
माल-असबाव
किताबे खुली की खुली
थम जायेंगी सांसे
मिट जाएगी देह
रेत पर लिखे नाम की तरह
रह जायेंगी हसरतें
तलाशती
किसी और प्रणेता को।
...............................

अंतर्द्वंद

सिमटा हूँ
अपने-आप में
ऐसा नहीं कि
दूरियां हैं दरमियाँ
लेकिन नहीं चाहता
कमज़ोर करती
सहानुभूती
हाँ रो लेता हूँ
दीवारों की ओट में
उनकी तरह दृढ़ बनने
अपने-आप से लड़ने
..................................................
प्रकाशित: दैनिक नवज्योति १३ मई १९९८.

साजिशें

उजालों के ख़िलाफ़
साजिशें
हमेशा होती रहती हैं
कल भी, आज भी,
आने वाले दिनों में भी,
राम, कृष्ण और गांधी
तुम्हारी प्रासंगिकता भी
कभी ख़त्म नहीं होगी
बेहद जरूरी हो तुम
इस दौर में
उजालों के ख़िलाफ़
साजिशों के दौर में
......................................
प्रकाशित: राजस्थान पत्रिका १९९७

मंगलवार, मई 23, 2006

सुहागन

वह सह जाती है
झिडकियां
पी जाती है
घूँट अपमान के
वह बह जाती है
आवेश में
कूद जाती है कुएँ में
जल जाती है
स्टोव पर
मुक्त करने परिवार को
और खुश होती है
सुहागन कहलाकर
सिन्दूर की
एक लकीर के साथ जीने
कई बार मरती है वह
...............................

सोमवार, मई 22, 2006

अबके बरस - New Year Commitment

आइये
अबके बरस
तोड़ डालें
दिल की सरहदें
बुझा दें
तेजाबी चेहरे
छोड़ दें
आग का रास्ता
समझ लें
फूल की भाषा
आइये
अबके बरस
संभालें
माँ की सौंधी हथेलियाँ
पनघट पे दमकते सिंदूर
गलियों के चहकते चेहरे
आइये
अबके बरस
एक अदद कोशिश करें
इंसान बनने की
~~~~~~~~~~

सोमवार, मई 08, 2006

हाईकू

लौटा जो गाँव
सबके सब मिले
शेहराए से (प्रकाशित: हाइकू दर्पण)
~~~~~~~~~

कहने तुम्हें
शब्द जरूरी हुए
दायरे आए
~~~~~~~~~
मत पुकारो
आकर न लौटूंगा
सूरज हूँ मैं
~~~~~~~~~

की थी मन्नते
सूखे हलक लिए
बरसे ओले
~~~~~~~~~

सच पंगु है
जब से लग गए
पाँव झूठ के
~~~~~~~~~
तोड़ते गए
बार-बार मुझको
अपने जो हैं
~~~~~~~~~

रविवार, मई 07, 2006

हाईकू -2


भागता रहा
फ़िर भी न बचा मैं
साया हो तुम
~~~~~~~~~~
भोगूं मैं कैसे
ये हासिल मंजिलें
राहों थका हूँ
~~~~~~~~~~

बिखर गई
प्रेम करते हुए
मन की गाँठें
~~~~~~~~~~

सूरज छिपा
तो तिमिर भेदने
आया चन्द्रमा
~~~~~~~~~~

दुनिया देखी
हाशिये से हमने
भीड़ न भाए
~~~~~~~~~~

शनिवार, मई 06, 2006

तुम (काव्यालय.कॉम)

एक ख़्वाब की नदी सी
मुझ में जो बहती हो
अलसाए दिन ढ़ोते हैं
उनींदी रातों को

मैं जानता नहीं ये क्या है
मैं सोचता नहीं ये क्यों है

हर बार तुम्हे मिटाता हूँ
हर बार तुम बन जाती हो

एक ख़्वाब की नदी सी ...
~~~~~~~~~~~~~~~
काव्यालय.कॉम पर प्रकाशित # चित्र सौजन्य: विराज देव

शुक्रवार, मई 05, 2006

बारिश (अनुभूति.ऑर्ग)


नंगी पहाडियाँ
तान लेती हैं
हरी चुनरिया
खेतों में लहलहाती है
बालियों की ताज़गी
घूँघट ओढे पोखरों से
तकती है
प्रकृति
'काकू' के खलिहान के
उस ओर बंध जाता है
इन्द्रधनुष
बच्चे भीगी बालू से
बनाते हैं घरौंदें
बारिश में
एक कविता-सा
लगता है गाँव मेरा।
..............................
अनुभूति.ऑर्ग में प्रकाशित

गुरुवार, मई 04, 2006

माज़ी (वेबदुनिया.कॉम)

डायरी में पड़ी
गुलाब की
सूखी-पीली पंखुडियां
दराजों में बंद
पुराने ख़त
और हवा में तैरती
जानी-पहचानी-सी खुशबू
ले जाती है मुझे
यादों की सलीबों पर
जहाँ हर लम्हा
बेंधता है-
दर्द के दायरे से बाहर होने तक
माना कि
माज़ी लौटता नहीं,
पर मिटता भी कहाँ है दोस्त
कभी-न-कभी
कहीं-न-कहीं
किसी-न-किसी शय में
रहता है ज़िंदा
जीते-जागते आज के बीच।
~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रकाशित: वेबदुनिया.कॉम

बुधवार, मई 03, 2006

दीवारें (वेबदुनिया)

खोते-खोते
अहमियत
एक-दूसरे की ज़िंदगी में

बोते गए दीवारें
फ़िर बैठे रहे
इसे नियती समझकर

और की जब
फांदने की कोशिश...

तो बीच खड़े थे
अहम
इस तरह
पिसते रहे हम
अहम और अहमियत
के दरमियाँ
ताजिंदगी।
..............................
वेबदुनिया.कॉम में प्रकाशित

मंगलवार, मई 02, 2006

बेटी (वेबदुनिया.कॉम)

कँवल कोपल-से
नन्हें निर्मल
नाज़ुक पाँव
कपोलों से गाहे-बगाहे छूटती
मासूम मुस्कान
साफ़ निश्छल आँखें...
गुज़रता हूँ जब
तेरी दुनिया से
तो हो जाता है रौशन
मेरा आँगन
मानो खिल आयें हो
हज़ारों सूरज
बेटी
तुम हो
किरण ख़्वाबों की
जरिया ताबीरों का
~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रकाशित: वेबदुनिया.कॉम

सोमवार, मई 01, 2006

खामोशी (वेबदुनिया.कॉम)

जब तुम
चुप रहती हो
उदास हो जाता है
आसमान
बादलों की ओट में
चाँद भी होता है
गुमसुम
तब सुनाई नहीं देते
स्वर बस्ती के
हवाएं बंधी लगती हैं
खूंटे से
तब चुप लगता है
सारा जहाँ
सिवाय उस शोर के
जो उठता है
दिल के किसी कोने से
कि मैं
सुनना चाहता हूँ
चुप तुम्हारी
जब तुम चुप रहती हो
~~~~~~~~~~~~~~~~~
प्रकाशित: वेबदुनिया.कॉम

Cartoon-Volcker

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शुक्रवार, जनवरी 06, 2006

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बुधवार, जनवरी 04, 2006