('अन्नादोलन' के बरक्स मैंने चार कवितायें लिखी हैं. उसी क्रम में अंतिम कड़ी, जो चुनावी अन्ना पार्टी की घोषणा के बाद लिखी है.. बाकी 3 कवितायें मेरे इसी ब्लॉग पे मौजूद हैं. )
बहुत हुआ अन्ना,अब घर चलते हैं
थक गया हूँ..
मैं भी तुम्हारी तरह
ये बात और है कि
कभी इसी जंतर-मंतर से
भरी थी आख़िरी दम तक लड़ने की हुंकार..
देख रहा हूँ यहीं पे सच की हार
आपने तो यहीं से नाप लिया
चुनावी तंतर का रास्ता
हम भी चलते हैं
देहात में चोट्टे सरपंच
और बेशरम बाबू को खुश करके
इंदिरा आवास पास कराना है
उनके लठैतो से डरकर
उन्ही को जीताना है
लिहाजा तुम्हारे कुछ भक्त
अन्ना टोपी को उलटकर बना लेंगे नाव
जीतने के लिए चुनाव
बस दुःख यही है..कि
अब से अगस्त को
एक क्रान्ति के गर्भपात के लिए भी याद किया जाएगा..
किसी भी ईमानदार कोशिश
की जयकार से पहले
देश सौ बार सोचेगा.
अन्ना !
तुम्हारे साथ-साथ
सच के प्रति आस्था भी हारी है.















